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“एसडीओपी की विदाई, सम्मान के साथ” क्या रिटायरमेंट के बाद भी ऐसा सम्मान मिलना, असली ताकत और पकड़ की निशानी है?

सिलवानी के बजरंग चौराहा स्थित बबलू पाल रेस्टोरेंट में एक ऐसा नज़ारा देखने को मिला, जिसने यह साबित कर दिया कि असली पहचान कुर्सी से नहीं, काम और रिश्तों से बनती है। सेवानिवृत्त एसडीओपी अनिल सिंह मोर्य के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में ढोल-नगाड़ों की गूंज, फूलमालाओं की बारिश और पगड़ी पहनाकर किया गया स्वागत किसी राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन से कम नहीं दिखा।

इस खास मौके पर भाजपा के वरिष्ठ नेता सलीम काजी, गिरीश चौरसिया, संदीप शर्मा सहित कई प्रभावशाली चेहरे मौजूद रहे। वहीं प्रशासनिक स्तर पर भी मजबूत उपस्थिति देखने को मिली, जिसमें सिलवानी थाना प्रभारी संजीत परते, सुल्तानगंज थाना प्रभारी श्यामराज सिंह तथा बम्होरी थाना प्रभारी प्रीतम सिंह राजपूत की मौजूदगी ने कार्यक्रम को और गरिमा दी।

कार्यक्रम का माहौल साफ इशारा कर रहा था कि रिटायरमेंट के बाद भी अनिल मोर्य का प्रभाव कम नहीं हुआ है। लोगों की भीड़, सम्मान का अंदाज और मंच पर मौजूद चेहरों की मौजूदगी यह बता रही थी कि उनके बनाए रिश्ते आज भी उतने ही मजबूत हैं।

यह आयोजन सिर्फ एक विदाई नहीं, बल्कि एक संदेश था—कि सच्ची ताकत कुर्सी में नहीं, बल्कि उस भरोसे और नेटवर्क में होती है जो इंसान अपने कार्यकाल में बनाता है।

 केके का सवाल: क्या रिटायरमेंट के बाद भी ऐसा सम्मान मिलना, असली ताकत और पकड़ की निशानी है?

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