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करोड़ों के फोर्टिफाइड चावल का खेल – क्या बालाघाट बनेगा मिसाल या फिर दफन हो जाएगा सच?

बालाघाट

बालाघाट में सामने आया कथित फोर्टिफाइड चावल                                      घोटाला

 अब केवल खाद्यान्न की हेराफेरी का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता, जवाबदेही और गरीबों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है। जिस चावल को गरीबों की थाली तक पहुंचना था, उस पर मुनाफाखोरी का आरोप पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है।

प्रारंभिक जांच में 17 ट्रकों की जब्ती, अनेक लोगों से पूछताछ और कई रसूखदारों के जांच के दायरे में आने की खबरें यह संकेत देती हैं कि मामला साधारण नहीं है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल सरकारी संपत्ति की चोरी नहीं, बल्कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग के हिस्से पर डाका माना जाएगा।
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि राज्य स्तर पर जांच एजेंसियां सक्रिय हैं, वहीं दूसरी ओर एफसीआई का यह दावा कि आवंटन प्रक्रिया में किसी सरकारी नीति का उल्लंघन नहीं हुआ, कई नए सवाल खड़े करता है। आखिर यदि नीति का उल्लंघन नहीं हुआ, तो इतनी बड़ी मात्रा में सरकारी चावल निजी नेटवर्क तक कैसे पहुंचा? जवाबदेही किसकी तय होगी? और सबसे बड़ा प्रश्न—क्या इस पूरे नेटवर्क के पीछे बैठे वास्तविक मास्टरमाइंड तक जांच पहुंचेगी?
ऐसे मामलों में अक्सर निचले स्तर के लोगों पर कार्रवाई होती है, जबकि असली लाभार्थी कानून की पकड़ से दूर रह जाते हैं। यदि इस प्रकरण में भी ऐसा हुआ, तो जनता का विश्वास जांच एजेंसियों और शासन-प्रशासन दोनों पर कमजोर होगा।
यह समय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, बल्कि निष्पक्ष और समयबद्ध जांच का है। दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई होना ही सुशासन की कसौटी होगी। साथ ही, यदि कोई निर्दोष जांच के दायरे में आया है, तो उसे भी न्याय मिलना चाहिए।
      👉       अभयवाणी की राय में
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, यह प्रकरण केवल एक जिले का नहीं, बल्कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली की विश्वसनीयता की परीक्षा है। करोड़ों रुपये के कथित फोर्टिफाइड चावल घोटाले की परतें पूरी तरह खुलनी चाहिए और जांच का अंतिम निष्कर्ष सार्वजनिक किया जाना चाहिए। क्योंकि गरीब के हक पर किसी भी प्रकार की सेंध लोकतंत्र और जनकल्याणकारी व्यवस्था—दोनों के लिए गंभीर चुनौती है।

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