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रायसेन: सीएम हेल्पलाइन में नंबर-1 का ‘तमगा’, पर जनता की संतुष्टि पर ‘बड़ा सवाल’

कागजों में 87.96% का जादुई स्कोर, लेकिन सोशल मीडिया पर फूट रहा जनता का दर्द; 

क्या सिर्फ रैंकिंग के लिए हो रहा शिकायतों का ‘खेला’?

रायसेन | कृष्णकांत सोनी मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की ताजा ग्रेडिंग में रायसेन जिला एक बार फिर प्रदेश में शीर्ष पर काबिज हुआ है। 87.96 प्रतिशत वेटेज स्कोर के साथ जिला लगातार एक साल से नंबर-1 बना हुआ है। प्रशासनिक बैठकों में पीठ थपथपाई जा रही है, अधिकारियों को बधाई मिल रही है और ग्रेडिंग सुधारने के लिए डी-ग्रेड वालों को घुड़की दी जा रही है। लेकिन इस चमक-धमक वाली रैंकिंग के पीछे की ‘जमीनी हकीकत’ कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

सोशल मीडिया पर खुला ‘कच्चा चिट्ठा’


प्रशासन भले ही अपनी पीठ थपथपा ले, लेकिन सोशल मीडिया पर आम जनता का आक्रोश प्रशासन के दावों की पोल खोल रहा है। जिले की इस उपलब्धि पर जब जनता से फीडबैक मिला, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। लोगों का सीधा आरोप है कि सीएम हेल्पलाइन की शिकायतों का निराकरण ‘समाधान’ से नहीं, बल्कि ‘दबाव’ से किया जा रहा है।

जनता की आवाज: सीधे आरोप

>   प्रेशर का खेल: मोहित सक्सेना जैसे जागरूक नागरिकों का कहना है कि शिकायत बंद करने के लिए आवेदकों पर भारी दबाव बनाया जाता है। बिना किसी ठोस कार्रवाई के फाइलों को बंद करने की जल्दबाजी दिखती है।

>   रिश्वत का ‘शॉर्टकट’: देव किरार (पत्रकार) के मुताबिक, कुछ विभागों में शिकायत को ‘फोरक्लोज’ (जबरन बंद) कराने के लिए 1000 से 1500 रुपये तक का खेल चल रहा है।

>   संपर्क है तो काम है: लोगों का यह भी कहना है कि जब तक पुलिस या प्रशासन में ‘व्यक्तिगत पहचान’ न हो, तब तक 112 या हेल्पलाइन जैसी सेवाएं केवल कागजी साबित होती हैं।

क्या सिर्फ ‘ग्रेडिंग’ बचाने की हो रही कवायद?

सूत्रों की मानें तो जिलों के बीच नंबर-1 आने की इस होड़ ने असली ‘जनता की सेवा’ को पीछे छोड़ दिया है। अधिकारियों पर ऊपर से दबाव है कि पेंडेंसी कम की जाए, जिसके चक्कर में शिकायतों को बिना आवेदक की संतुष्टि के ‘सैटिस्फाइड’ मार्क कराने के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। ग्रेड-बी और सी वाले विभागों को नोटिस और डी-ग्रेड वालों पर कार्रवाई का खौफ तो है, लेकिन यह खौफ काम करने के लिए कम और ‘फाइल बंद’ करने के लिए ज्यादा नजर आता है।

बड़े सवाल, जिनका जवाब बाकी है:

 अगर जिला नंबर-1 है, तो धरातल पर लोग आज भी छोटे-छोटे कामों के लिए दफ्तरों के चक्कर क्यों काट रहे हैं?

 क्या शिकायतों का निराकरण वास्तव में हो रहा है, या सिर्फ पोर्टल पर ‘संतुष्टि’ दर्ज कराई जा रही है?

 क्या प्रशासन उन आरोपों की जांच करेगा जिसमें पैसे लेकर शिकायतें बंद कराने की बात कही जा रही है?

निष्कर्ष: सीएम हेल्पलाइन का उद्देश्य पीड़ित को न्याय दिलाना था, न कि जिलों के बीच आंकड़ों की रेस जीतना। अगर ऊपर तक पहुंच रही रिपोर्ट ‘परफेक्ट’ है और नीचे जनता ‘त्रस्त’ है, तो समझ लेना चाहिए कि सिस्टम में कहीं न कहीं बड़ा झोल है। अब देखना यह है कि इस ‘नंबर-1’ की चमक में दबी जनता की चीखें जिम्मेदार अधिकारियों के कानों तक कब पहुंचती हैं।

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